बिखरा के तेरी जुल्फ़ें मुझ पे!
बिखरा के तेरी जुल्फ़ें मुझ पे,
तुम मुझे बेवजह पागल करती हो!
महका कर मेरी महफ़िल,
मेरी नज़रों में उतरके दिल घायल करती हो!
तुम शमा हो,और, मैं परवाना...
मैं चाहूं तेरी शमा के तप में जल जाना!
जब से तुम्हें देखा है,जब से तुम्हें जाना है,
तब से मैं सुध-बुध खोया जैसे मैं कोई दीवाना है!
क़त्ल करती हैं तेरी निगाहें,
तेरे संग चलती हैं मेरी राहें!
हौश में मैं नहीं रहा,
थाम ले तू मुझे अपनी बाहें!
बिखरा के तेरी जुल्फ़ें मुझ पे,
तुम मुझे बेवजह पागल करती हो!
महका कर मेरी महफ़िल,
मेरी नज़रों में उतरके दिल घायल करती हो!
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© Abdul Ahad GujBihari
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