ख़्वाब वाली हसीना!
मेरा दिल जैसे इक बंज़र ज़मीं,
इसके कोश़ें में अभी कोई रहता नहीं!
कोई इसका दरवाज़ा थकथकाए,
ऐसी कोई अब तक हसीना नहीं!
चल रहे यूं ही अकेले किसी राह पे,
पर,कल कोई दिलरुबा मिलेगी सही!
भले वक़्त लंबा बिछेगा,
पर,उसी का है इंतजार जो मेरे ख़्वाब में थी दिखी!
जिसे पसंद करेंगी मेरी मम्मी,
जो मेरे नसीब़ में हैं लिखी!
ख़ाईश़ है मेरा हो उनसे राब़्ता,
किसी दिन उनसे मिलूं जो बनेंगी मेरी ज़िंदगी!
मेरा दिल जैसे इक बंज़र ज़मीं,
इसके कोश़ें में अभी कोई रहता नहीं!
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© Abdul Ahad GujBihari
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