तोतली-पुकार!
पुकार जैसे कोई तोतली-आवाज़,,,
पुकार जैसे कोई दिली-सदा,,,
टूटे-टूटे लफ़्ज़ को ही भले,
पर,जोड़-जोड़ के लफ़्ज़ों को पढ़ लेती हैं मेरी अम्मां!
मेरे सपनों में परियों जैसा करना परवाज़,,,
मेरे आंखों को भाती उनकी हर इक प्यारी अदा,,,
नादानी पे मेरे,पकड़े मेरे कान ही भले,
पर,अंधेरें राह को वो बनती हैं मेरी श़म्मा!
ग़ुस्सें में भी उनके लबों पे बनते हैं प्यारे अल्फ़ाज़,,,
फ़टकार के साथ-साथ प्यार भी करती हैं ज़्यादा,,,?
वो मेरे ख़ुराफ़ातीपन से नाराज़ होती हैं भले,
पर,तन्हा राहों में मेरे साथ रहती हैं मेरी प्यारी मम्मा!
पुकार जैसे कोई तोतली-आवाज़,,,
पुकार जैसे कोई दिली-सदा,,,
© Abdul Ahad GujBihari
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मां...
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